ईश्वर

1Eshvar
ईश्वर को लेकर आज विभिन्न मत स्थापित हो गये है| कोई उन्हें कठिन तप, साधना से, कोई पहाड़ो, कंदराओ और कोई उन्हें मंदिरों के गर्भ में ढूंढकर, आस्था प्रकट करता है| आज मनुष्यों का वो वर्ग भी है जो उसे मानता भी नहीं| लेकिन गौर करने वाली बात है कि आज से २५०० वर्ष पूर्व ईश्वर विषय में एक ही मत था| महाभारत युद्ध में हुए विनाश के फलस्वरुप मतिभ्रम, स्वार्थी और वर्चस्वशाली मनुष्यों के अनेक मत हुए जो आज तक ईश्वर भक्ति, आस्था और कर्मकांड में विभिन्नता लिए हुए है| क्या ईश्वर खेलने-खिलाने, श्रृंगार करने और उसके सामने दिए गए अन्य जीवो के बलिदानों से प्राप्त होता है? उत्तर है नहीं| जिसने ये सृष्टि बनाई भला वो क्यों उसके खात्मे में अपनी प्रसन्नता और संतुष्टि दिखायेगा? भला वो क्यों जीवों को आपत्ति और दुःख में डालना चाहेगा? इस तरह उस पर पक्षपात का आरोप लगेगा, और उसके ना होने के प्रमाण पर भी सवाल होने पर सृष्टि क्रम अनुपालन हाशिये पर आ जायेगा| चूँकि कोई भी कार्य बिना कारण के नहीं होता इसलिए ये मानना भी सर्वथा अनुचित है कि इस अप्रतिम सृष्टि की रचना, हम मानवों की उत्पत्ति और अन्य जीव-जंतु, वनस्पति का प्रयोजन अकारण ही व्यर्थ है| आकाश गंगाओ का सञ्चालन हो या ग्रहों को व्यवस्थित करना, परमाणुओ का संलयन हो या तत्वों का विघटन, कोई असीम शक्ति की उपस्थिति का अनुभव होता है| ऐसे में ईश्वर कौन है यह जानना मन की जिज्ञासा को शांत करने जैसा ही है| ईश्वर की अनुभूति स्वाभाविक और अनायास ही सृष्टि का आलोकन करने और अपने अस्तित्व के चिंतन से हो जाता है| इसमें दो राय नहीं कि इस समूचे संसार को चलायमान, उसके पालन और संहार करने में ईश्वर का ही कार्य है|

स्वयं से ये प्रश्न करें-
१. सृष्टि का इतना विविधतापूर्ण विस्तार क्या प्रयोजनहीन हो सकता हैं? सृष्टि का इतना सर्वांगीण विकास एवं ह्रास क्या बिना किसी के करने वाले के हो सकता है?
२. सृष्टि में लाखों नियम शाश्वत् से सतत काम कर रहे है, क्या इन नियमो का प्रकार काम करना बिना किसी करने वाले के सम्भव हो सकता है? सृष्टि के अनन्त विस्तार में अनन्त ग्रह-उपग्रह, तारें-उल्काएं आदि बनते एवं विनष्ट होते रहते है, क्या इनका बनना व बिगड़ना तथा नियमानुसार कार्यरत रहना क्या बिना किसी संचालक के संभव हो सकता है?
३. प्रत्येक मनुष्य सभी चेतन-अचेतन रूप से सर्व प्रयासों में हार के बाद एक ऐसी असीम सर्वव्यापक सत्ता के सम्मुख विनीत क्यों हो जाते है कि जैसे केवल वही अब उनका एकमात्र आश्रय बचा है?
४. नास्तिक व्यक्तियों द्वारा मार्गदर्शित एवं संचालित संगठन भी कुछ वर्ष पश्चात् एक असीम सर्वशक्तिमान सहायक सत्ता के रूप में उन्हीं की पूजा-उपासना क्यों शुरू कर देते है?
५. बिना संचालक, बगैर कर्ता या बिना किसी चेतन के गति देने वाले के क्या यह सब अपने आप स्वाभाविक रूप से संपन्न हो सकता है? एक छोटे से छोटा कण भी स्वयं कुछ नहीं कर सकता तो अनन्त सृष्टि का अनन्त विस्तार बिना किसी चेतन सत्ता के कैसे सम्भव हो सकता है?
६. क्या इस जगत में प्राणी बिना किसी ज्ञान, बोध के इस पृथ्वी पर जीवन बना और विकास कर सकते है?

यह जड़ सृष्टि बिना किसी चेतन सत्ता के अपने आप कुछ नहीं कर सकती है| यही चेतन सत्ता ईश्वर, परमात्मा, ब्रह्म, पुरुषोत्तम आदि नामों से व्यक्तियों द्वारा संबोधित की जाती है| यही वो सर्वशक्तिमान परमात्मा है जिसने हमे जीवनोपयोगी जानकारी और आत्मिक विकास हेतु ज्ञान विज्ञान का ज्ञान दिया| धर्म एवं विज्ञान दोनों ही इस निष्कर्ष पर लाखों बार पहुचे है कि जड़ सृष्टि के पीछे एक कोई चेतन शाश्वत सत्ता कार्यरत है| धर्म शास्त्रों में ईश्वर का भलीभांति विस्तृत विवरण दिया है| देखिये-

स पर्यगाच्छुक्रमकायमवर्णमस्नाविरँ शुद्धम् अपापविद्धम्
कविर्मनीषी परिभू: स्वयंभूर्याथातथ्यतोअर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:|| – यजुर्वेद ४०.८, ईशोपनिषद् मंत्र-८

हे मनुष्यों! जो अनन्त शक्तियुक्त, अजन्मा, निरन्तर, सदा मुक्त, न्यायकारी, निर्मल, सर्वज्ञ, सबका साक्षी, नियन्ता, अनादिस्वरूप ब्रह्म कल्प के आरम्भ में जीवों को अपने कहे वेदों से शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को जानने वाली विद्या का उपदेश न करे तो कोई विद्वान् न होवे और न धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के फलों के भोगने को समर्थ हो, इसलिए इसी ब्रह्म की सदैव उपासना करो|
अतः ईश्वर है और सर्वव्यापक रूप से समस्त संसार में व्याप्त है| उसी के अधीन हम और सम्पूर्ण जगत है| उसी के अधीन हमारे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष है| वही हमे पालने वाला और सब फलों का यथायोग्य फल देने वाला है| उसी के आनंद में जीवन यापन और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो| ईश्वर को ना मानने वाले ईश्वर शब्द को ही मानकर उसे नकारते है, यह अज्ञानता है|
यह भी स्पष्ट ज्ञात होवे कि ईश्वर और भगवान में असमानता होती है, दोनों ही भिन्न है, देखिये-

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ।। -(विष्णु पु० 6/5/74)

अर्थात् सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य इन छह का नाम भग है। इन छह गुणों से युक्त महान मनुष्य को भगवान कहा जा सकता है। इनम़े से जिसके पास एक भी हो उसे भी भगवान् कहा जा सकता है जैसे श्रीराम के पास औसत रूप से सारे ही गुण थे (भग थे)। इसलिए उन्हें भगवान कहकर सम्बोधित किया जाता है लेकिन ईश्वर कहना बुद्धिमानी नहीं|
वे भगवान् थे, ईश्वर नहीं! न ही ईश्वर के अवतार थे। वे एक महामानव थे। एक महापुरुष थे। महान आत्मा थे। महान आत्माएं अनेकों होती हैं। लेकिन परमात्मा केवल एक ही होता है| भगवान स्वरुप कृष्ण, हनुमान, सीता, लक्ष्मण और अन्य भी है| परन्तु ईश्वर केवल एक है जो सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और पूर्ण है| अतः वास्तविक ईश्वर को जानकार माने और उससे सद्बुद्धि मांग, सत्कर्म कर मोक्ष की कामना करें| यही मनुष्य जन्म और जीवन की सार्थकता है|