Introduction

 

Introduction To Vedasविचार कीजिये जो ईश्वर सब जानने वाला और दयालु है तो क्या मनुष्यों को बिना ज्ञान के पृथ्वी में उत्पत्ति करने से ईश्वर पर दोष नहीं लगेगा? क्या वह मनुष्यों को बिना सृष्टि, सांसारिक, विज्ञान और आत्मिक ज्ञान के कर्म करने को बाध्य करेगा? स्वाभाविक है कि उत्तर नहीं ही होगा| अगर हा होता तो फिर हम ईश्वर को मानते ही क्यों? सृष्टि के अन्य जीव-जन्तुओ को जैसे ईश्वर नैसर्गिक और स्वाभाविक ज्ञान देके उत्पन्न करता है वैसे ही सभी प्राणियों में बुद्धिशाली, मननशील मनुष्यों को भी परिपूर्ण ज्ञान अवश्य ही देगा| तो वो पूर्ण ज्ञान क्या है| संसार में बहुत से धर्म-मतों के धर्म शास्त्रों का अध्यन करके हम ज्ञात कर सकते है कि कौन सा ईश्वरीय ज्ञान है और कौन सा मनुष्य ज्ञान हो सकता है| चूँकि ईश्वर सर्वज्ञ है तो उसका ज्ञान भी हमारे लिए पूर्ण, सार्थक और सात्विक, उन्नति लाभ के लिए होगा| और यह बात भी ध्यान रखने की आवश्यक है कि मनुष्य भी शुन्य से अल्प ज्ञान की ओर देख, सुन और महसूस करके ही विद्वान और अनुभवी बनता है| इस प्रकार मनुष्यों द्वारा बनाया ज्ञान ग्रन्थ भी अल्पज्ञता लिए होगा| साथ ही ये भी जानने की जरुरत है कि मनुष्यों के ज्ञान में प्रतिस्पर्धा, हठता, द्वेष, मनुष्यता और विज्ञान विरोधी बातों का समावेश हो सकता है क्योकि संभव है कि अगर ईश्वर समर्पण ना होगा तो वो ज्ञान स्वार्थता और मिथ्या बातों का भंडार होगा| सृष्टि आरम्भ से वेद वर्तमान तक है, उसके प्रादुर्भाव के कई लाखों वर्षों बाद जैन, बौद्ध, ईसाई, इस्लाम, सिख और अन्य मत जैसे शैव, शाक्त, वैष्णव के नाना प्रकार के ग्रन्थ बने| ज्ञातत्व हो कि सभी ऋषि एक मत से वेदों को ही ईश्वर ग्रन्थ मानते है और आदि शंकराचार्य, महर्षि दयानंद जी बाकियों को मनुष्य कृत| सनातन धर्म के धर्म ग्रन्थ वेद है और अन्यो के अपनी-अपनी आसमानी किताबे| सनातन धर्म का मुख्य आधार वेद ही है । वेद न हों तो ” सनातन ” शब्द भी व्यर्थ है । क्योंकि वेद  के कारण ही हम सनातनी हैं । दुनिया में अनेक मत-मतान्तर, मज़हब और सम्प्रदाय उपस्थित हैं   मत-मज़हबों में सबसे मुख्य ईसाई और मुस्लिम हैं । इन दोनों मतों की अपनी–अपनी अलग ईश्वरीय किताब हैं जिन्हें हम कुरआन और बाइबल के नाम से जानते हैं । पर जब हम ईसाई और मुस्लिम मत के आलावा इस संसार में सबसे प्राचीनतम् जाति ” आर्य जाति ” पर दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि आर्यों के पास भी एक ” ईश्वरीय संदेश ” है जिसे ” वेद ” कहते हैं । वेद का ज्ञान चार पुस्तकों के रुप में हमारे मध्य विद्यमान है । जिन्हें क्रमश:  ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के नाम से जानते हैं । पहले ये ज्ञान पुस्तकों के रुप में नहीं था। इसे परमात्मा ने सृष्टी के आदि में चार मनुष्यों (ऋषि) के हृदय में प्रकाशित किया था, और ये वेद ज्ञान लोग सुनकर ग्रहण करते थे । बाद में इसको पुस्तक का रुप दिया गया । जब ये ज्ञान एक दूसरे से सुनकर प्राप्त किया जाता था औ है इसलिए इसे श्रुति कहते हैं । परमात्मा ने ऋग्वेद का ज्ञान अग्नि ऋषि को, यजुर्वेद  का ज्ञान वायु ऋषि को , सामवेद का ज्ञान आदित्य ऋषि को , और अथर्ववेद का ज्ञान अंगिरा ऋषी को दिया । परमात्मा द्वारा प्रदत्त यह ज्ञान न तो कभी नष्ट होता है और न कभी जीर्ण होता है । वेद ने कहा ” देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति ” अर्थात् देव के काव्य को देखो, जो न मरता है न जीर्ण होता है । इस वेदोपदेशानुसार जब वेद ज्ञान न तो नष्ट और न तो पुराना होता है तो फिर कुरान और बाइबल की आवश्यकता क्या ? कुरान और बाइबल ” वेद ‘ को न जानने के कारण दुनिया में आई , इसलिए इन दोनो पुस्तकों में अविद्या की भरमार है ।