Existence-ism

Astitatvavadअनादि सत्ताओं का सिद्धान्त

1) जड-अद्वैतवाद: केवल एक जगत अनादि है. इस मत की परिकल्पना बृहस्पति नामक व्यक्ति ने की थी.

जब तक जियो, सुख से जियो, ऋण लेकर घी पियो,

शरीर के भस्मीभूत होने पर पुनर्जन्म नहीं होता. स्वर्ग, नरक, परलोक कुछ नहीं होता.

 

चार्वाक, आभाणक, बौद्ध एवं जैन, जगत की उत्पत्ति स्वभाव से मानते हैं. जो-जो स्वाभाविक गुण हैं, उस-उस से द्रव्य संयुक्त होकर सब पदार्थ बनते हैं, कोई जगत का कर्त्ता नहीं.

इस मत के अनुसार, “जगत सत्य है, और ब्रह्म (परमात्मा) मिथ्या” है, अतः चार्वाक, बौद्ध, जैन को नास्तिक मत भी कहते हैं.

निमित्त कारण: जगत

उपादान कारण: जगत

साधारण कारण: जगत

 

चार्वाक, बौद्ध, जैन का मत कोई-कोई बात छोड़कर एक सा है, अन्तर इतना है की बौद्ध और जैन जीवात्मा, परलोक को भी मानते हैं. बौद्ध एवं जैनमत लगभग 2500 वर्ष पुराने हैं.

 

 

2) चेतन-अद्वैतवाद (निर्विशेष-अद्वैत / विवर्त्तवाद): केवल एक परमात्मा अनादि है. इस मत की परिकल्पना आदि-शंकराचार्य ने की थी.

आदि-शंकराचार्य विक्रमादित्य से 300 वर्ष पूर्व हुए थे. इस प्रकार आदि-शंकराचार्य को हुए, 2372 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं.

जड-अद्वैतवाद (नास्तिकता) के खण्डन के उद्देश्य से शंकराचार्य ने ठीक विपरीत “ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या” का सिद्धान्त प्रस्तुत किया.

निमित्त कारण: परमात्मा

उपादान कारण: परमात्मा

साधारण कारण: परमात्मा

 

इस सिद्धान्त के मुख्य विचार निम्नलिखित हैं:

१) दृश्य-जगत मिथ्या है, वास्तव में एक ही शुद्ध चैतन्य सत्ता है, जो निर्गुण, निर्विशेष, शुद्ध ज्ञान-स्वरुप है, जिसको परब्रह्म (परमात्मा) कहते हैं.

२) परमात्मा की विशेष शक्ति है, जिसको माया, अविद्या कहते हैं, जो की न सत् है, न असत है, अर्थात् अनिर्वचनीय है. जिस प्रकार एक मायावी अपनी शक्ति से अनेक प्रकार के पदार्थों को प्रकट करता है, उसी प्रकार परमात्मा अपनी माया से इस जगत को प्रकट करता है.

३) माया-सम्बद्ध ब्रह्म (परमात्मा) ही इस जगत का उपादान कारण है. माया के सम्बन्ध से ब्रह्म को ईश्वर कहते हैं, और अविद्या के सम्बन्ध से ब्रह्म को जीव कहते हैं.

४) जीव अविद्या के कारण अपने ब्रह्म-स्वरुप को भूलकर, बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियों और शरीर आदि की उपाधियों को अपना वास्तविक स्वरुप समझकर, उनकी अवस्थाओं को अपनी अवस्था मान लेता है. इस अभ्यास के कारण अल्पज्ञता, अल्प्शक्तिमत्ता और परिच्छिन्नता की सीमा में आकर कर्त्ता और भोक्ता बन जाता है.

५) जीव और ब्रह्म की एकता के अनुभव-सिद्ध पूर्णज्ञान से अविद्या का नाश हो जाने पर शरीर, इन्द्रियों, मन, अहंकार और बुद्धि आदि उपाधियों में से आत्मभाव मिट जाता है, जिसके उपरान्त कर्त्ता-भोक्ता का अभिमान निवृत्त हो जाने पर कर्म उनके फलों एवं आवागमन से मुक्ति पाकर परिच्छिन्नता और अल्पज्ञता की सीमा को तोड़कर अपने अनन्त शुद्ध ज्ञानस्वरुप में अवस्थित हो जाता है.
3) विशिष्ट-अद्वैतवाद: इस मत के जनक रामानुजाचार्य (जन्म:1016 ईस्वी) हैं. विशिष्ट-अद्वैतवाद के अनुसार, शंकराचार्य का ब्रह्म-सत्य, जगत मिथ्या का सिद्धान्त झूठा है, चित् (जीव), अचित् (भौतिक-जगत) और ब्रह्म ये तीनों यद्यपि भिन्न हैं, तथापि जीव और जड-जगत ये दोनों एक ही ब्रह्म के शरीर हैं. जैसा की बृहदारण्यक-उपनिषद् (३|७) में कहा गया है, इसीलिए चित्-अचित्-विशिष्टब्रह्म एक ही है. विशिष्टरूप से ब्रह्म को अद्वैत मानने से यह वाद विशिष्टाद्वैत कहलाता है. इस मत के अनुसार, मोक्ष में जीवात्मा, ब्रह्म को प्राप्त होकर ब्रह्म के समान हो जाता है, ब्रह्म में लय नहीं होता.

 

4) द्वैत-अद्वैतवाद: इस मत के जनक निम्बार्काचार्य (जन्म-1162 ईस्वी) हैं. इनके अनुसार, यद्यपि जीव, जगत और ईश्वर तीनों परस्पर भिन्न हैं, तथापि जीव और जगत का व्यवहार तथा अस्तित्व ईश्वर की इच्छा पर अवलम्बित है, स्वतन्त्र नहीं. ईश्वर में ही जीव और जगत के सूक्ष्म तत्व रहते हैं. इनका मत ज्ञान की अपेक्षा भक्ति-प्रधान है, और वैष्णव-सम्प्रदाय से सम्बन्धित है.

 

5) द्वैतवाद: ब्रह्म और जीव केवल दो ही अनादि सत्ता हैं. इस मत के जनक श्रमदानन्दतीर्थ (मध्वाचार्य : जन्म-1197 ईस्वी) हैं. इनका मत है, की ब्रह्म और जीव को कुछ अंशों में एक और कुछ अंशों में भिन्न मानना परस्पर-विरुद्ध और असम्बद्ध बात है. इसीलिए दोनों को सदा भिन्न ही मानना चाहिए, क्योंकि दोनों में पूर्ण अथवा अपूर्ण रीति से भी एकता नहीं हो सकती. लक्ष्मी, ब्रह्म की शक्ति, ब्रह्म के अधीन ही रहती है. मध्वाचार्य का मत पुराण पर आधारित है.

 

6) शुद्ध-अद्वैतवाद: इस मत के जनक वल्लभाचार्य (जन्म-1479 ईस्वी) हैं. इनके अनुसार, मायात्मक जगत मिथ्या नहीं है. माया ईश्वर की इच्छा से विभक्त हुई, एक शक्ति है. माया-अधीन जीव को बिना ईश्वर की कृपा के मोक्ष नहीं हो सकता, इसीलिए मोक्ष का मुख्य साधन ईश्वर-भक्ति है. माया-रहित शुद्ध जीव और परब्रह्म (शुद्ध-ब्रह्म) एक वस्तु ही हैं, दो नहीं. इसीलिए इस मत को शुद्ध-अद्वैत कहते हैं.

 

प्राय: उपर्युक्त सभी मत चार-प्रकार की मुक्ति मानते हैं,

१) सालोक्य मुक्ति: ईश्वर के लोक में निवास करना

२) सामीप्य मुक्ति: ईश्वर के समीप निवास करना

३) सारुप्य मुक्ति: ईश्वर के समान हो जाना

४) सायुज्य मुक्ति: ईश्वर से संयुक्त हो जाना

 

7) त्रैतवाद: केवल ईश्वर, जीव और प्रकृति अनादि हैं. ऋषि दयानन्द ने कभी भी इस त्रैतवाद शब्द का प्रयोग नहीं किया. अद्वैतवाद और द्वैतवाद की शैली के आधार पर त्रैतवाद की परिकल्पना की गयी है. इस मत का आधार ऋग्वेद १.१६४.२०, अथर्ववेद ९.९.२०, श्वेताश्वतर उपनिषद् ४.६ का निम्नलिखित मन्त्र है:

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते,

तयोरन्यः पिप्पलं स्वादवत्त्यनश्ननन्यो अभि चाकशीति.

दो पक्षी जो साथ रहने वाले और मित्र हैं, वे दोनों एक ही वृक्षरूपी प्रकृति का आश्रय लेते हैं, उनमें से एक पक्षी (जीव) स्वाद वाले फल को खाता है, और दूसरा पक्षी (परमात्मा) फल ना खाता हुआ केवल साक्षी भाव से रहता है.

 

निमित्त कारण: परमात्मा, जीवात्मा

उपादान कारण: प्रकृति

साधारण कारण: अपरिभाषित

 

8) यथार्थवाद: ईश्वर, जीव, प्रकृति(परमाणु), काल एवं आकाश अनादि हैं. वेद के द्वा-सुपर्णा मन्त्र के दृष्टान्त में प्रत्यक्ष रूप से तीन सत्तायें (ईश्वर, जीव, प्रकृति) ही प्रतीत होती हैं, जबकि दो अन्य सत्तायें (काल, आकाश) भी परोक्ष-रूप से उपस्थित है, क्योंकि बिना आकाश के वृक्ष हो नहीं सकता और बिना काल के व्यतीत हुए फल का खाना आदि भोग भी असम्भव है. आकाश में ही परमाणु (प्रकृति) स्थित होते हैं, जो स्थूल होकर दृश्य-जगत बनकर आकाश में ही रहते हैं.

 

ऋषि दयानन्द सरस्वती ने, सत्यार्थ-प्रकाश अष्टम-समुल्लास, के प्रारम्भ में तीन पदार्थ (ईश्वर, जीव, जगत का कारण) को अनादि बताया. इसी प्रकरण में आगे और स्पष्ट करते हुए ऋषि लिखते हैं, की “जगत की उत्पत्ति के पूर्व, परमेश्वर, प्रकृति, काल और आकाश तथा जीवों के अनादि होने से इस जगत की उत्पत्ति होती है. यदि इनमें से एक भी न हो, तो जगत भी न हो.”

द्वादश समुल्लास में, ऋषि लिखते हैं, “आकाश, काल, जीव और परमाणु ये नए वा पुराने कभी नहीं हो सकते क्योंकि ये अनादि और कारण रूप से अविनाशी हैं.

 

निमित्त कारण: परमात्मा, जीवात्मा

उपादान कारण: प्रकृति

साधारण कारण: काल, आकाश

 

निमित्त कारण: जिसके बनाने से कुछ बने, न बनाने से न बने. आप स्वयं बने नहीं, दूसरे को प्रकारान्तर से बना देवे.

निमित्त कारण दो प्रकार के होते हैं. १) मुख्य-निमित्त २) साधारण-निमित्त

उपादान कारण: जिसके बिना कुछ न बने, वही प्रकारान्तर होकर बने भी और बिगड़े भी.

साधारण कारण: जो बनाने में साधन और साधारण निमित्त हो.