वर्ण-व्यवस्था

Varnvyvastha

 

संसार में अनेक जातियाँ हैं, जैसे मनुष्य, पशु, पक्षी, सरीसृप, वृक्ष आदि। जब वृक्षों, पक्षियों, पशुओं, मछली आदि जलचरों की अनेक प्रजातियाँ पायी जाती हैं, तो ऐसा कैसे हो सकता है, कि मनुष्य जाति में भी अनेक वर्ण ना पाए जायें ?

आम का वृक्ष एक भिन्न जाति का होता है, किन्तु इस आम के भी अनेक वर्ण (प्रजातियाँ) पायी जाती हैं, सबका रूप, रंग, स्वाद, गुण भी भिन्न-भिन्न होता है।

यदि मनुष्य जाति में, एक ही वर्ण होते तो सभी मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ भी समान होती। जिस प्रकार, सभी ऊँटो को कण्टक (वृक्षों के अंकुर) के, सभी सूअरों को अभक्ष्य के, सभी शुकादि पक्षी को फल के, सभी गिद्धों को माँस के, भक्षण की एक सी प्रवृत्ति है, इस प्रकार की समान प्रवृत्ति सभी मनुष्यों में नहीं दिखती। किसी की तपस्या में, पठन-पाठन में, किसी की युद्ध में, किसी की व्यापार, खेती आदि में, किसी की सेवा करने आदि में भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ होती हैं, जो की स्पष्ट सूचित करता है, की मनुष्य जाति में अनेक वर्ण होते हैं|

 

क्या कोई चाहेगा की, आम के सभी भिन्न वर्ण (प्रजातियाँ) एक हो जाएँ, केवल मालदा-आम रहे शेष प्रजातियों को लोप हो जाए ?

क्या कोई चाहेगा की, अन्य सभी जातियाँ समाप्त हो जायें, केवल मनुष्य जाति रहे? कोई चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकता।

क्या होगा यदि समाज में सभी चिकित्सक, अध्यापक बन जाएँ ?

क्या होगा यदि समाज में सभी सेना, पुलिस में भर्ती हो जायें ?

क्या होगा यदि समाज में सभी व्यवसायी बन जाएँ ? (सम्प्रति यही हो रहा है।)

क्या होगा यदि समाज में सभी किसान बन जाएँ ?

 

ऐसे अनेक प्रश्न बनते हैं, जिसका उत्तर है की, “ऐसा हो ही नहीं सकता”, क्योंकि समाज में सभी मनुष्यों की रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं, इन भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों से युक्त मनुष्यों को चार मुख्य विभागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

१) जिनकी रूचि मुख्यतः ज्ञान में हो। (ब्राहमण, अज्ञान का नाश करता है)

२) जिनकी रूचि मुख्यतः बल में हो। (क्षत्रिय, अन्याय को मिटाता है)

३) जिनकी रूचि मुख्यतः धन में हो। (वैश्य, अभाव को दूर करता है)

४) जिनकी रूचि मुख्यतः सेवा में हो। (शूद्र, उपर्युक्त तीनों कार्यों को करने में असमर्थ होता है)

 

वर्ण का शाब्दिक अर्थ गुण, रंग, प्रवृत्ति होता है। मनुष्य जाति के ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये वर्ण कहलाते हैं।

निरुक्त अध्याय-2, खण्ड-3 के अनुसार, “वर्णः वृणोते:” अर्थात् इनका नाम “वर्ण” इसीलिए है, कि जैसे जिसके गुण, कर्म, स्वभाव हों, वैसा ही उसको अधिकार देना चाहिए।

 

शतपथ ब्राह्मण काण्ड-5 के अनुसार, उत्तम कर्म करने से उत्तम विद्वान् ब्राहमण-वर्ण का होता है। परम-ऐश्वर्य, बल-वीर्य के होने से मनुष्य क्षत्रिय वर्ण होता है।

वेद में, वर्णों का प्रतिपादन करने वाला प्रमाण निम्नलिखित हैं:-

 

ऋषि= नारायणः    देवता= पुरुषः    छन्द= निचृदनुष्टुप्         गायन-स्वर= गान्धारः

 

ब्रा॒ह्म॒णो॑ऽस्य॒ मुख॑मासीद्बा॒हू रा॑ज॒न्य॑: कृ॒तः । ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्य॑: प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत ॥

-ऋग्वेद मण्डल-१०, सूक्त-९०, मन्त्र-१२, यजुर्वेद अध्याय-३१, मन्त्र-११,

 

अर्थ: (अस्य) इस सर्वव्यापक परमात्मा की सृष्टि में (ब्रा॒ह्म॒ण) वेद और ईश्वर का ज्ञाता (मुख॑म्) मुख के तुल्य उत्तम ब्राहमण (आसीत्) है (बाहू) हाथों के तुल्य बल पराक्रमयुक्त (रा॑ज॒न्य॑:) क्षत्रिय (कृ॒तः) किया (यत्) जो (ऊ॒रू) जाँघों के तुल्य वेगादि कार्य करने वाला (तत्) वह (अस्य) इसका (वैश्य॑:) सर्वत्र प्रवेश करनेवाला वैश्य है (प॒द्भ्यां)सेवा और अभिमानरहित होने से (शू॒द्र:) मूर्खपन आदि गुणों से युक्त शूद्र (अ॑जायत) उत्पन्न हुआ।

 

वर्ण वंश के अनुसार नहीं अपितु गुण, कर्म, स्वभाव से निश्चित होते हैं, इसका मनुस्मृति (अध्याय १०) में निम्नलिखित प्रमाण है:

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् क्षत्रियाज्जात्मेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च । १०|६५|| (९८)

अर्थात् जो शूद्रकुल में उत्पन्न होके ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के समान गुण, कर्म, स्वभाववाला हो तो वह शूद्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाए, वैसे ही जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकुल में उत्पन्न हुआ हो और उसके गुण, कर्म, स्वभाव शूद्र के सदृश हों तो वह शूद्र हो जाय।

आपस्तम्ब के सूत्र के अनुसार,

धर्मचर्य्यया जघन्यो वर्णः पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ।

अधर्मचर्य्यया पूर्वो वर्णो जघन्यं जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ।

अर्थात् धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम-उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है, और वह उसी वर्ण में गिना जावे की जिस-जिस के योग्य होवे। वैसे ही अधर्माचरण से पूर्व अर्थात् उत्तम वर्णवाला मनुष्य अपने से नीचे-नीचे वाले वर्ण को प्राप्त होता है, और उसी वर्ण में गिना जावे।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को द्विज कहते हैं, क्योंकि आचार्य रूपी पिता और विद्यारूपी माता के गर्भ से इन तीनों का दूसरा जन्म होता है। बिना दूसरे जन्म के मनुष्यों में मनुष्यता नहीं आती. आचार्य द्वारा गुरुकुल में मनुष्यों के वर्णों का निर्धारण होता है।

सत्यार्थ प्रकाश, चतुर्थ समुल्लास के अनुसार, “यह गुण, कर्म, स्वभाव से वर्णों की व्यवस्था कन्याओं की सोलहवें वर्ष और पुरुषों की पच्चीसवें वर्ष की परीक्षा में नियत करनी चाहिए, और इसी क्रम से अर्थात् ब्राह्मण वर्ण का ब्राह्मणी से, क्षत्रिय वर्ण का क्षत्रिया से, वैश्य वर्ण का वैश्या से और शूद्र वर्ण का शूद्रा के साथ विवाह होना चाहिए। तभी अपने-अपने वर्णों के कर्म और परस्पर प्रीति भी यथायोग्य रहेगी।”

 

ब्राह्मण वर्ण के कर्त्तव्य, कर्म और गुण:

अध्यापनमध्ययनम् यजनं याजनं तथा।

दानं प्रतिग्रह चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् – मनुस्मृति अध्याय १ ||८८|| (५१)

 

शमोदमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानम् विज्ञानमास्तिक्यम् ब्रह्मकर्मस्वभावजम् — गीता अध्याय १८ श्लोक ४२

 

अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति|

विद्यातपोभ्याम् भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति — मनुस्मृति अध्याय ५ ||१०९|| (१७)

अर्थात् ब्राह्मण वर्णस्थ मनुष्यों में निम्नलिखित 15 कर्म और गुण अवश्य होने चाहिए:

१) वेदादि ग्रन्थ पढना

२) वेदादि ग्रन्थ पढाना

३) यज्ञ करना

४) यज्ञ कराना

५) दान देना

६) दान लेना (किन्तु प्रतिग्रह लेना नीच-कर्म है: विद्या देने हेतु दान लेना वह नीच कर्म है )

७) शम = मन से बुरे कार्य की इच्छा भी न करनी और उसको अधर्म में कभी प्रवृत्त न होने देना

८) दम = चक्षु और श्रोत्र आदि इन्द्रियों को अन्यायाचरण से रोककर धर्म में चलाना

९) तप = सदा ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय होके धर्मानुष्ठान करना

१०) शौच = शरीर आदि की पवित्रता (पानी से शरीर, ज्ञान से बुद्धि, सत्य से मन, विद्या-तप से जीवात्मा की शुद्धि)

११) क्षान्ति = निन्दा-स्तुति, सुख-दुःख, शीतोष्ण, क्षुधा-तृषा, हानि-लाभ, मान-अपमान आदि हर्ष-शोक छोड़कर धर्म में दृढ-निश्चय रखना

१२) आर्जव = कोमलता, निरभिमान, सरलता

१३) ज्ञानम् = वेदादि शास्त्रों को सांगोपांग पढ़कर, पढ़ाने का सामर्थ्य, सत्य-असत्य का निर्णय

१४) विज्ञान = पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों को विशेषता से जानकार उनसे यथायोग्य उपयोग लेना।

१५) आस्तिक्य = कभी वेद, ईश्वर, मुक्ति, पूर्व-परजन्म, धर्म, विद्या, सत्संग की निन्दा कभी न करना और माता, पिता, आचार्य और अतिथियों की सेवा को न छोड़ना।

 

क्षत्रिय वर्ण के कर्त्तव्य, कर्म और गुण:

प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च।

विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः। — मनुस्मृति अध्याय-१ ||८९|| (५२)

 

शौर्यं तेजोधृतिर्दाक्ष्यम् युद्धे चाप्यपलायनम्।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्मस्वभावजम्  — गीता अध्याय-१८, श्लोक-४३

 

अर्थात् क्षत्रिय वर्णस्थ मनुष्यों में निम्नलिखित ११ कर्म और गुण अवश्य होने चाहिए:

१) रक्षा = पक्षपात छोड़कर न्याय से प्रजा की रक्षा, श्रेष्ठों का सत्कार, दुष्टों का तिरस्कार करना

२) दान = विद्या, धर्म की प्रवृत्ति और सुपात्रों की सेवा में धनादि पदार्थों का व्यय करना

३) इज्या = अग्निहोत्रादि यज्ञ करना वा कराना

४) अध्ययन = वेदादि शास्त्रों का पढना तथा पढाना

५) विषयेष्वप्रसक्ति = विषयों में न फँसकर जितेन्द्रिय रहके सदा शरीर और आत्मा से बलवान रहना

६) शौर्य्य = सैकड़ों और सहस्त्रों से भी युद्ध करने में अकेले को भय न होना

७) तेजः = सदा तेजस्वी अर्थात् दीनतारहित प्रगल्भ दृढ रहना

८) धृति = धैर्यवान होना

९) दाक्ष्य = राजा और प्रजा सम्बन्धी व्यवहार और सब शास्त्रों में चतुर होना

१०) युद्धे = युद्ध में दृढ निःशंक रहकर ऐसे लड़ना की विजय निश्चित हो, युद्ध से कभी पलायन न करना

११) ईश्वरभाव = पक्षपातरहित होकर सबके साथ यथायोग्य व्यवहार करना, प्रतिज्ञा को पूरा करना, प्रतिज्ञा-भंग न होने देना।

 

वैश्य वर्ण के कर्त्तव्य, कर्म और गुण:

पशूनाम् रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च।

वणिक्पथम् कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च। — मनुस्मृति अध्याय-१ ||९०|| (५३)

अर्थात् वैश्य वर्णस्थ मनुष्यों में निम्नलिखित 7 कर्म और गुण अवश्य होने चाहिए:

१) पशुरक्षा = गाय आदि पशुओं का पालन-वर्द्धन करना

२) दान = विद्या, धर्म की प्रवृत्ति और सुपात्रों की सेवा में धनादि पदार्थों का व्यय करना

३) इज्या = अग्निहोत्रादि यज्ञ करना वा कराना

४) अध्ययन = वेदादि शास्त्रों का पढना तथा पढाना

५) वणिक्पथम् = सब प्रकार के व्यापार करना

६) कुसीदं = एक सैकड़े में चार, छह, आठ, बारह, सोलह वा बीस आनों से अधिक ब्याज और, मूल से दुगुना अर्थात् एक रूपया दिया हो तो सौ वर्षों में भी दो रुपये से अधिक न लेना न देना।

७) कृषि = खेती करना

 

शूद्र वर्ण के कर्त्तव्य, कर्म और गुण:

एकमेव हि शूद्रस्य प्रभु: कर्म समादिशत् ।

एतेषामेव वर्णानाम् शुश्रूषामनसूयया ।। — मनुस्मृति अध्याय-१ ||९१|| (५४)

अर्थात् शूद्र वर्णस्थ मनुष्यों का एक ही कर्म है, की निन्दा, ईर्ष्या, अभिमान आदि दोषों को छोड़कर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों की सेवा यथावत् करना ।

ऐसी व्यवस्था रखने से सभी मनुष्य उन्नतिशील होते हैं, क्योंकि उत्तम वर्णों को भय होगा कि जो हमारे सन्तान मूर्खत्वादि दोषयुक्त होंगे तो शूद्र हो जायेंगे और शूद्र वर्ण आदि में भी उत्तम वर्णस्थ होने के लिए उत्साह बढेगा।

जिस-जिस मनुष्य में जिस-जिस वर्ण के गुण, कर्म, स्वभाव हों, उस-उस वर्ण के अधिकार में प्रवृत्त कराना राजा आदि सभ्य जनों का कर्त्तव्य है। विद्या और धर्म के प्रचार का अधिकार “ब्राह्मण” को देना, क्योंकि वे पूर्ण विद्यावान् और धार्मिक होने से इस कार्य को यथायोग्य कर सकते हैं। क्षत्रियों को राज्य के अधिकार देने से कभी राज्य की हानि वा विघ्न नहीं होता। पशुपालन एवं कृषि का अधिकार वैश्यों को ही होना योग्य है, क्योंकि वे इस कार्य को कुशलता से करने का सामर्थ्य रखते हैं। शूद्र को सेवा का अधिकार इसीलिए है, क्योंकि वह विज्ञानविद्यारहित होने से विज्ञान-सम्बन्धी कार्य नहीं कर सकता, किन्तु शरीर के सभी कार्य (भोजन पकाना, सफाई आदि) कर सकता है।