Arya Samaj

Arya Samajसर्व विद्याओं का आदिमूल परमेश्वर हैं| ईश्वर की सत्ता अजर-अमर-सर्वव्यापक-सर्वेश्वर-अनन्त-अनादि-सृष्टिकर्ता आदि होना, वेद सब सत्यविद्याओं की पुस्तक हैं, सत्य के ग्रहण व असत्य के परित्याग की हिम्मत, धर्मानुसार काम करने, सर्व संसार का उपकार करना, सभी से प्रेमपूर्वक बर्ताव करना, विद्या की वृद्धि करने, अपनी व अन्यों की उन्नति में तत्परता तथा सामाजिक मर्यादाओं के पालन में मर्यादित रहना-ये मर्यादाएं या नियम स्वामी दयानंद सरस्वती ने सन् १८७५ ई० आर्य समाज की स्थापन दिवस में निर्धारित किये थे|

आर्य समाज के नियम

१. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सबका आदिमूल परमेश्वर है।

२. ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है।

३. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है, वेद का पढना–पढाना और सुनना–सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।

४. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडने में सर्वदा उद्घत रहना चाहिये।

५. सब काम धर्मानुसार, अर्थात सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिये।

६. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।

७. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य बरतना चाहिये।

८. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।

९. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिये किंतु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।

१०. सब मनुष्यों को सामाजिक एवं सर्वहितकारी नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने सब स्वतंत्र रहें|