Sunday, December 17, 2017

सृष्टि सम्वत् 1,96,08,53,117 वर्ष

ओ३म्

11Arya Anaryaआर्य वह है जो  इस पृथ्वी पर सत्य, अहिंसा, पवित्रता, परोपकारादि व्रतों को विशेष रुप से धारण करते हैं । आर्य शब्द ‘ऋ’ धातु से बनता है जिसका अर्थ “गति-प्रापणयो:” है अर्थात् गति-ज्ञान, गमन, प्राप्ति करने और प्राप्त कराने वाले को आर्य कहते हैं । इस धात्वर्थ के अनुसार आर्य वे हैं जो ज्ञान सम्पन्न हैं, जो सन्मार्ग की और सदा गति करने वाले पुरुषार्थी हैं और जो ईश्वर तथा परमानन्द को प्राप्त करते तथा तदर्थ प्रयत्नशील होते हैं । इसी  को लेकर आर्य की निम्न व्याख्या कोशों में दी गई है जैसे – पूज्य: श्रेष्ठ, धार्मिक, धर्मशील, मान्य, उदारचरित| इसी को लेकर निरुक्ताकार ने आर्य को ईश्वर का पुत्र कहा – “आर्य ईश्वरपुत्र:” अर्थात् आर्य ईश्वर का पुत्र है या सच्चे ईश्वर के पुत्र आर्य ही होतें हैं, अनार्य नहीं ।अनार्य तो अच्छे लोगों के द्वारा बहिष्कृत है| अनार्य के भी भेद होते हैं – एक अनार्य मूर्खादि या अल्पज्ञता के कारण कहलाते हैं और एक आर्य वो है जो दुष्ट है जैसे रावण , कंस आदि। तो जो दुष्ट हैं वो ईश्वर के पुत्र नहीं इसलिए ईश्वर के द्वारा दण्ड पाते हैं ।

वेद में परमात्मा ने अपने इसी पुत्र को भूमि प्रदान की और कहा ” अहम् भूमिमददार्यं” अर्थात् मैं यह भूमि आर्यों को देता हूँ| लोक में भी एक अच्छा पिता उसी को अपना असली पुत्र कहता है जो घर की जिम्मेदारी को संभाल सके, परिवार को साथ लेकर चल सके| दुष्ट पुत्र को तो पिता भी अपना पुत्र कहने से इंकार कर देते हैं| इसलिए परमात्मा ने अपने आर्य पुत्रों को  अपनी भूमि दी क्योंकि एक आर्य ही इस भूमि को स्वर्ग बना सकता है ,जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने किया।

आर्य लोग अपने पिता के आदेश पर चलते हैं, ईश्वर का आदेश वेद है, उपदेश वेद है, जो वेद विहित कर्मों का पालन करते हैं उसे आर्य कहते हैं, जो नहीं करते वो ईश्वर के पुत्र नहीं, उन्हें अनार्य कहते है।