स्वामी श्रद्धानंद और महात्मा गाँधी

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Swami Sharaddhanand हाल ही में गुजरात में पटवारी (जिसे वहाँ तलाठी कहते हैं) पद के लिए आयोजित परीक्षा में एक प्रश्न पूछा गया, ‘बापू को पहली बार महात्मा की उपाधि किसने दी?’ एक परीक्षार्थी (संध्या मारू) ने गुरुदेव टैगोर का नाम लिखा (प्रायः लोग यही नाम लेते हैं), पर परीक्षक की दृष्टि में सही उत्तर था सौराष्ट्र का एक गुमनाम पत्रकार। अतः उसने ‘निगेटिव मार्किंग’ के अंतर्गत अंक काट लिए। परीक्षार्थी इस विषय को हाई कोर्ट में ले गई और मामला वहाँ विचाराधीन है। (दैनिक जागरण 16 फरवरी 2016, पृ. 2)
‘गुमनाम’ लोगो के बारे में तो निश्चयपूर्वक कुछ कहना संभव नहीं पर ‘नाम’ वाले लोगों में पहला नाम टैगोर का नहीं स्वामी श्रद्धानंद का है। राष्ट्रीय जीवन में आर्य समाज से सम्बन्धित महापुरुषों के योगदान की उपेक्षा करने वालों को यह तथ्य समझने के लिए इतिहास के कुछ पृष्ठ पलटनें होंगें। 18 वर्ष की आयु में मैट्रिक की परीक्षा उतीर्ण करने के बाद गाँधी जी बैरिस्टरी की पढाई करने इंग्लैण्ड चले गए। तीन वर्ष बाद वे भारत वापिस आए। लगभग दो वर्ष मुम्बई और राजकोट में वकालत करने के उपरांत वे 24 वर्ष की आयु में (सन् 1893 में) दक्षिण अफ्रीका चले गए जहाँ काफी संख्या में भारतीय रहते थें और उनमें से अधिक सम्पन्न व्यापारी थे । गाँधी जी वहाँ लगभग बीस वर्ष (सन् 1915 तक) रहे। यहीं रहते हुए उनके जीवन में ऐसे परिवर्तन आए जिनके कारण वे एक सामान्य बैरिस्टर से कहीं ऊपर उठकर एक नेता बन गए, कोई साधारण नेता नहीं, बल्कि ऐसे सच्चे नेता बन गए जिसने अपने लिए आधुनिक नेताओ वाली सुविधाएँ जुटाने के बजाए समाज के दबे-कुचले आम आदमी के जीवन को बदल देने वाली सुविधाएँ आम आदमी को ही उपलब्ध कराने में अपना सारा जीवन लगा दिया। भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष करने की योजना गाँधी जी ने यहीं रहते हुए बनाई। गाँधी जी जिस प्रकार की स्वतन्त्रता देश के लिए चाहते थे, उसकी रुपरेखा स्पष्ट करने वाली उनकी पुस्तक ‘हिंदस्वराज’ की रचना भी यहीं हुई जो 1909 में प्रकाशित हुई। यहाँ उन्होंने फिनिक्स आश्रम की स्थापना की जिसमे रहने वाले लोग अपने सभी काम स्वयं करते थे, फिर वह चाहे खेती का काम हो या जूता गाँठने का या मल उठाने का और यहाँ टालस्टाय आश्रम बनाया जिसमे उक्त बातों के साथ ही शिक्षा सम्बन्धी वे प्रयोग किए जिनके आधार पर बाद में बुनियादी शिक्षा (Basic Education) की योजना बनाई गई ।
Protest in SAदक्षिण अफ्रीका में उस समय अंग्रेजों का ही शासन था जो वहाँ प्रवासी भारतीयों के साथ तरह-तरह के भेदभावपूर्ण अपमानजनक व्यवहार करते थे । बैरिस्टर होने के बावजूद गाँधी जी को भी ऐसे अपमान सहने पड़े । डरबन कोर्ट में एक मुकदमे की पैरवी के लिए बैरिस्टर के रूप में उपस्थित गाँधी जी से मजिस्ट्रेट का ‘पगड़ी’ उतरने के लिए कहना (आज तो हम लोग अंग्रेजी संस्कृति इतनी अपना चुके हैं की अब शायद पगड़ी का महत्व ही न समझ पाएँ) या रेल में प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद उन्हें रेल से उतार देना और सामान प्लेटफोर्म पर फेंक देना जैसे दुर्व्यवहार से तो हम परिचित हैं ही । वहां की सरकार ने भारतीयों को अपमानित करने के लिए उन पर अनेक तरह के टैक्स लगाए और अनेक कानून बनाए जिनमें हर भारतीय की अनिवार्यता अपने फिंगर प्रिंट रजिस्टर कराना भी शामिल था।
दक्षिण अफ्रीका के ऐसे माहौल में गाँधी जी के राजनितिक जीवन की शुरुआत हुई। उन्होंने इस प्रकार के टैक्सों और कानूनों का अहिंसात्मक ढंग से विरोध करने के लिए भारत की एक पुरानी परम्परा को अस्त्र बनाया जिसे यहाँ उन्होंने ‘सत्याग्रह’ का नाम दिया। उनके प्रयासों से प्रवासी भारतीयों में स्वाभिमान जगा, वे संगठित हुए, और आठ वर्ष के संघर्ष के बाद गाँधी जी का यह प्रयोग सफल हुआ। दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने गाँधी जी से समझौता किया, 13 प्रकार के टैक्स समाप्त किए और फिंगर प्रिंट की जगह आवास सम्बन्धी प्रमाणपत्र पर ही अंगूठे के निशान को पर्याप्त मान लिया। इस सफलता ने एक ओर तो गाँधी जी को आत्मशक्ति से भर दिया और दूसरी ओर उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैला दी। भारत में भी उनकी यशः सुरभि राजनितिक वातावरण को महकाने लगी ।Gandhi Thrown Away From Train
जब यह ‘सत्याग्रह आन्दोलन’ दक्षिण अफ्रीका में चल रहा था, तब इस कार्य के लिए अपेक्षित आर्थिक सहयोग जुटाने के प्रयास वहाँ तो किए ही जा रहे थे, भारत में भी गोपाल कृष्ण गोखले, सी. एफ. एंड्रयूज (Charles Freer Andrews) (गाँधी जी उनके सेवा भाव और परोपकारी स्वभाव के कारण उनके नाम के प्रारम्भिक अक्षरों का विस्तार Christ’s Faithful Apostle के रूप में करते थे, और बाद में उन्हें ‘दीनबंधु’ कहने लगे) जैसे तत्कालीन नेता चन्दा इक्ट्ठा करने में जुटे थे। इस कार्य में उन्हें विशेष सहयोग उस समय के एक और बड़े नेता स्वामी श्रद्धानंद से एवं उनके द्वारा सन् 1902 में स्थापित शिक्षा की प्रसिद्ध संस्था गुरुकुल काँगड़ी (हरिद्वार) के शिक्षकों और विद्यार्थियों से मिला। जो पाठक गुरुकुल काँगड़ी और स्वामी श्रद्धानंद की ‘विशिष्टताओं’ से परिचित नहीं, उनकी जानकारी के लिए यह बताना आवश्यक है कि यह वह संस्था है जिसके बारे में ब्रिटेन के पूर्व प्रधान मंत्री ‘रैम्जे मैकडनाल्ड’ (जो ब्रिटेन में लेबरपार्टी के प्रथम प्रधानमन्त्री थे) ने कहा था – ‘मैकाले के बाद भारत में शिक्षा के क्षेत्र में जो सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक प्रयोग (एक्सपेरिमेंट) हुआ, वह गुरुकुल है। संयुक्त प्रांत (वर्तमान उप्र.) के तत्कालीन गवर्नर ‘सर जेम्स मेस्टन” ने गुरुकुल की कार्यप्रणाली देखने के बाद टिप्पणी की – ‘आदर्श विश्वविद्यालय की यह मेरी कल्पना है’ और स्वामी श्रद्धानंद – ये वे ही महापुरुष है जो पेशे से तो वकील थे पर उस समय कांग्रेस के एक बड़े नेता थे, आयु में गाँधी जी से 12 वर्ष बड़े थे, रौलेट एक्ट के विरोध में 30 मार्च 1919 को चाँदनी चौक दिल्ली से निकले जलूस का (जो इसी एक्ट के अंतर्गत प्रतिबंधित था) नेतृत्व उन्होंने ही किया था और अंग्रेजों की संगीनों के सामने अपना सीना तानकर कहा था – ‘ले, भोंक दे संगीन’ पर जिनकी भव्य आक्रति, रोबीली आवाज़ और अदम्य साहस को देखकर सैनिक डर के पीछे हट गए थे। इतना ही नहीं, जिन्होनें मुस्लिम समुदाय के आमन्त्रण पर 4 अप्रैल 1919 को दिल्ली की जामा मस्जिद में ‘वेद मंत्र’ पढ़ कर व्यख्यान दिया था (जी हाँ, जामामस्जिद में वेद मंत्र पढकर व्याख्यान, यह भारत का ही नहीं, विश्व के इतिहास में अपनी तरह का एकमात्र उदहारण है), जिनके बारे में पूर्व ब्रिटिश प्रधान मन्त्री ‘रैम्जे मैकडोनाल्ड ने कहा था कि ‘वर्तमान कल का कोई कलाकार पभु ईसा की मूर्ति बनाने के लिए यदि कोई सजीव माडल चाहे तो मैं इस भव्य मूर्ति (स्वामी श्रद्धानंद) की ओर इशारा करूँगा।2
पर श्रद्धानंद नाम तो उनका तब पड़ा जब 12 अप्रैल 1917 को उन्होंने सन्यास आश्रम में प्रवेश किया। जिस समय की हम बात कर रहे हैं उस समय उनका नाम ‘मुंशीराम’ था। वे अपने परिवार का त्याग कर चुके थे, ‘वानप्रस्थी’ का जीवन बिता रहे थे और अपना नाम ‘ मुंशीराम जिज्ञासु’ लिखते थे पर लोग उनके त्यागपूर्ण और परोपकार में डूबे जीवन को देखकर उन्हें सम्मान से ‘महात्मा मुंशीराम’ कहते थे। दक्षिण अफ्रीका के ‘सत्याग्रह आन्दोलन’ की सहायतार्थ भारत में चन्दा इकठ्ठा करने का प्रयास करने वाले दीनबंधु, सी. एफ. एंड्रयूज, गोपाल कृष्ण गोखले ने अपने मित्र महात्मा मुंशीराम को अपने काम में सहयोगी बनाया। मुंशीराम जी ने गाँधी जी के काम का महत्व एवं इस आन्दोलन के लिए आर्थिक सहयोग देने की आवश्यकता अपने गुरुकुल के विद्यार्थीयों, शिक्षकों को समझाई। सबने अपने भोजन में कमी करके, दूध-घी बन्द करके तथा हरिद्वार में बन रहे दुधिया बाँध पर मजदूरी करके एक हज़ार पांच सौ रूपये इकट्ठे किए जो मुंशीराम जी ने गोखले जी के पास भेज दिए। गोखले जी के पास यह राशि उस समय पहुंची जब वे हताश हो गहरी चिंता में डूबे हुए थे। कहते हैं यह राशि मिलने पर गोखले जी प्रसन्नता में कुर्सी से उछल पड़े और बोले कि यह पन्द्रह सौ नहीं पन्द्रह हजार से भी अधिक कीमती है। उन्होंने 27 नवम्बर, 1913 को महात्मा मुंशीराम जी को दिल्ली से हिंदी में अपने हाथ से पत्र लिखा जिसमें गुरुकुल के विद्यार्थियों एवं शिक्षकों की भावना और त्याग की भूरी-भूरी प्रशंसा की, इसे देशभक्तिपूर्ण कार्य बताया, भारत माता के प्रति कर्तव्यपालन बताया और देश के युवकों एवं वृद्धों के समक्ष एक आदर्श उदाहरण बताया ।8
उन्होंने और श्री एंड्रयूज ने गाँधी जी को गुरुकुल के लोगों के इस त्याग से अवगत कराया। अतः गाँधी जी ने मुशीराम जी को नैटाल, दक्षिण अफ्रीका से 27 मार्च 1914 को पहला पत्र अंग्रेजी में लिखा (1) । पत्र के प्रारम्भिक अंश का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है :
‘प्रिय महात्मा जी,
मि. एंड्रयूज ने आपके नाम और काम का मुझे परिचय दिया है । मैं अनुभव कर रहा हूँ कि मैं किसी अजनबी को पत्र नही लिख रहा। इसलिए आशा है कि आप मुझे ‘महात्मा जी’ लिखने के लिए क्षमा करेंगे। मैं और मि. एंड्रयूज आपकी और आपके काम की चर्चा करते हुए आपके लिए इसी शब्द का प्रयोग करते हैं…..’
इस प्रकार शुरू हुए पत्र- व्यवहार के माध्यम से गाँधी जी की मुंशीराम जी से निकटता बढती गई। गाँधी जी ने बाद में अपने पत्र ‘यंग इंडिया’ में स्वामी श्रद्धानंद जी के संस्मरणों में उनके पहले पत्र की चर्चा करते हुए लिखा – ‘स्वामी जी ने मुझे जो पत्र भेजा वह हिंदी में था। उन्होंने मुझे ‘मेरे प्रिये भाई’ कहकर सम्बोधित किया था। इस बात ने मुझे मुंशीराम का प्रेमी बना दिया (2)।9
गाँधी जी ने जब भारत वापस आने और स्वतन्त्रता के लिए आन्दोलन करने की योजना बनाई तो पहले अपने आश्रम के विद्यार्थियों को भारत भेजने की व्यवस्था की। अहमदाबाद में तब उस आश्रम की स्थापना का निश्चय नहीं हो पाया था जिसे बाद में ‘सत्याग्रह आश्रम’ कहा गया। इसलिए गाँधी जी ने सी. एफ. एंड्रयूज से ऐसा ‘स्थान’ खोजने के लिए कहा जहाँ विद्यार्थी रह सकें और उनका अध्ययन भी जरी रह सके। श्री एंड्रयूज ने इसके लिए दो स्थानों का चयन किया – गुरुकुल काँगड़ी और शांतिनिकेतन। सबसे पहले ये विद्यार्थी सन् 1914 में मगनलाल गाँधी के साथ गुरुकुल आ गए और लगभग एक वर्ष वहाँ रहने के बाद कुछ समय शांतिनिकेतन में रहे। गाँधी जी की अनुपस्थिति में श्री सी. एफ. एंड्रयूज ही इनकी व्यवस्था संभाल रहे थे।
अगले वर्ष अर्थात 1915 के प्रारम्भ में गाँधी जी भारत आए। काठियावाड में अपने परिजनों के साथ कुछ समय बिताने के बाद उन्होंने महात्मा मुंशीराम जी को 8 फरवरी 1915 को हिंदी में पत्र लिखकर उनसे मिलने की इच्छा जताई (3)।
‘…..मेरे बालकों के लिए जो परिश्रम आपने उठाया और जो प्यार बतलाया उस वास्ते आपका उपकार मानने को मैंने भाई एंड्रयूज को लिखा था, लेकिन अपने चरणों में शीश झुकाने को मेरी उम्मीद है। इसलिए बिना आमन्त्रण आने का भी मेरा फर्ज बनता है। मैं बोलपुर (शांतिनिकेतन) पीछे फिरूँ उससे पहले आपकी सेवा में हाज़िर होने की मुराद रखता हूँ…
पर गाँधी जी के विद्यार्थी अब शांतिनिकेतन में थे। अतः उन्होंने पहले वहाँ जाने का निश्चय किया। अभी तक गाँधी जी का गुरुदेव टैगोर से कोई सीधा सम्पर्क नहीं हुआ था, श्री एंड्रयूज ही उनके सहयोगी – मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे। अतः श्री एंड्रयूज ने गुरुदेव टैगोर को सूचना दी की 17 फरवरी को गाँधी जी पत्नी कस्तूरबा सहित शांतिनिकेतन पहुंचेंगें। गुरुदेव टैगोर शांतिनिकेतन में ही थे जहाँ उन्हें यह सूचना यथासमय मिल गई पर शांतिनिकेतन में गाँधी जी का स्वागत करने के बजाय वे बिना किसी को कुछ बताए चुपचाप कलकत्ता चले गए। उन्होंने ऐसा क्यों किया – इसका कोई स्पष्टीकरण न तब दिया न बाद में दिया। उनकी जीवनी लिखने वाले लेखक – द्वय सुश्री कृष्णा दत्ता और एंड्रयू रोबिनसन ने गुरुदेव के इस व्यवहार पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा है कि ऐसा लगता है की गुरुदेव ने जानबूझकर गाँधी जी की उपेक्षा की (4)।
इस प्रकार शांतिनिकेतन की पहली यात्रा में गाँधी जी की गुरुदेव से भेंट तक नहीं हो सकी (5)। इतना ही नहीं, गुरुदेव ने कलकत्ता से श्री एंड्रयूज को 18 फरवरी 1915 को जो पत्र लिखा, उसमें भी गाँधी जी को ‘मिस्टर’ लिखा (6) पर बाद में जब यह पत्र प्रकाशित करने का अवसर आया तब श्री एंड्रयूज ने अपने हाथ से मिस्टर काटकर ‘महात्मा’ लिख दिया (7)।
संयोग से 19 फरवरी 1915 को गाँधी जी के राजनितिक गुरु श्री गोपालकृष्ण गोखले का स्वर्गवास हो गया। यह समाचार मिलते ही गाँधी जी 20 फरवरी को पुणे चले आए। वहाँ शोकसभा 3 मार्च 1915 को आयोजित की गई। इसमें भाग लेने के बाद गाँधी जी गुरुदेव टैगोर से मिलने 6 मार्च 1915 को बोलपुर (शांतिनिकेतन) पुनः गए। काका कालेलकर ने इस भेंट का वर्णन किया है, पर उसमें ‘महात्मा’ शब्द का कोई उल्लेख नहीं है। उनके अनुसार गाँधी जी के शांतिनिकेतन पहुचने के बाद भी गुरुदेव अपने कक्ष में ही सोफे पर बेठे रहे। गाँधी जी ने जब कक्ष में प्रवेश किया तो वे सोफे से उठे और गाँधी जी को सोफे पर ही बेठने का संकेत किया, पर गाँधी जी सोफे के बजाय नीचे बिछे कालीन पर बैठ गए, फिर गुरुदेव भी नीचे कालीन पर बैठे।
गाँधी जी और टैगोर की बातचीत उसी अंग्रेजी में हुई जिससे मुक्ति पाने के लिए गाँधी जी आजीवन लालायित रहे। कुछ दिन शांतिनिकेतन में ठहरकर गाँधी जी ने वहाँ की व्यवस्था का अध्ययन किया। कई बातें उन्हें पसंद नहीं आई। जैसे- वहाँ सभी काम नौकरों से कराया जाता था। वहाँ शाकाहारी और मांसाहारी भोजन एक साथ बनता था और एक साथ ही परोसा जाता था । बाद में गाँधी जी ने सुझाव दिया की नौकरों को हटा देना चाहिए ताकि विद्यार्थी अपने सारे कम स्वयं करें। गुरुदेव गाँधी जी के विचारों से पूर्णतया सहमत तो नहीं थे, फिर भी उन्होंने उस दिन (10 मार्च को) नौकरों को छुट्टी दे दी और आगे से 10 मार्च को शांतिनिकेतन में गाँधी दिवस मनाने की घोषणा कर दी।
लगभग एक महीने बाद 8 अप्रैल 1915 को गाँधी जी गुरुकुल कांगड़ी पहुंचें। उस वर्ष हरिद्वार में कुम्भ भी था। गुरुकुल में आने पर आगे बढकर महात्मा मुंशीराम जी नें गाँधी जी का स्वागत किया और गाँधी जी ने अपनी श्रद्धावश उनके चरण छूकर नमस्कार किया। यही वह पावन क्षण था जब मुंशीराम जी ने भी गाँधी जी को ‘महात्मा जी’ कहकर संबोधित किया और गले से लगा लिया। एक महापुरुष ने जब दुसरे महापुरुष की साधना का सम्मान करते हुए उन्हें ‘महात्मा’ की पदवी दी तो मानों सारा वातावरण धन्य हो उठा और बाद में यही सम्मान सूचक शब्द देश में ही नहीं, पुरे विश्व में उनकी पहचान बन गया। मौखिक रूप से कहे गए इस संबोधन को गुरुकुल के शिक्षकों, विद्यार्थियों नें अपने उस अभिनन्दन पत्र में स्थायी रूप प्रदान कर दिया जो इस अवसर पर उन्होंने तैयार किया और गाँधी जी को सदर भेंट किया। इसमें उन्होंने गाँधी जी को महात्मा जी कहकर ही संबोधित किया। गुरुकुल में सारा वार्तालाप हिंदी में ही हुआ। अभिनन्दन पत्र स्वीकार करते हुए गाँधी जी ने हिंदी में भाषण देते ही कहा :
‘मैं हरिद्वार केवल महात्मा जी के दर्शन के लिए आया हूँ। मैं उनके प्रेम के लिए कृतज्ञ हूँ। मि. एंड्रयूज ने मुझको भारत में अवश्य मिलने योग्य जिन तीन महापुरुषों का नाम बतलाया था, उनमें महात्मा जी एक हैं….. मुझे अभिमान है की महात्मा जी मुझको ‘भाई’ कहकर पुकारते हैं । मैं अपने में किसी को शिक्षा देने की योग्यता नहीं समझता, किन्तु महात्मा जी जैसे देश के सेवक से मैं स्वयं शिक्षा लेने का अभिलाषी हूँ ……’
गुरुकुल काँगड़ी की यह यात्रा गाँधी जी के लिए अविस्मरणीय बन गई। बाद में जब उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘सत्य’ के प्रयोग लिखी तो उसमे इस यात्रा का उल्लेख करते हुए लिखा, ‘जब मैं पहाड़ से दिखने वाले महात्मा मुंशीराम जी के दर्शन करने और उनका गुरुकुल देखने गया तो मुझे वहाँ बड़ी शांति मिली। हरिद्वार के कोलाहल और गुरुकुल की शांति के बीच का भेद स्पष्ट दिखाई देता था। महात्मा जी ने अपने प्रेम से मुझे नहला दिया। ब्रह्मचारी (गुरुकुल के विद्यार्थियों को ब्रह्मचारी कहा जाता था) मेरे पास से हटते ही न थे…. यद्यपि हमें अपने बीच कुछ मतभेद का अनुभव हुआ, फिर भी हम परस्पर स्नेह की गांठ में बंध गए … मुझे गुरुकुल छोड़ते हुए बड़ा दुःख हुआ ।
गुरुकुल काँगड़ी में गाँधी जी के आगमन, उनके अभिनन्दन, ‘महात्मा’ संबोधन, आदि के समाचार तत्कालीन समाचार पत्रों में भी छपे । गाँधी जी ने कुल चार बार शांतिनिकेतन की यात्रा की और शुरू की दो यात्राओं को छोड़ बाद की दो यात्राओं में से किसी यात्रा में गुरुदेव टैगोर ने भी गाँधी जो को ‘महात्मा’ कहकर संबोधित किया होगा, पर उसका गुरुकुल काँगड़ी के अभिनन्दन पत्र जैसा कोई ‘रिकार्ड’ उपलब्ध नहीं। हाँ, यह निश्चित है की बाद में वे गाँधी जी को महात्मा जी कहने लगे थे। गुरुकुल काँगड़ी में भी गाँधी जी स्वामी श्रद्धानंद के जीवनकाल में दो बार और उनके शहीद होने के लगभग चार महीने बाद 19 मार्च 1927 को दीक्षांत भाषण देने आए।
इस प्रकार भारत में गाँधी जी को सबसे पहली बार ‘महात्मा’ कहकर संबोधित करने वाले प्रमुख व्यक्ति थे “स्वामी श्रद्धानंद (महात्मा मुंशीराम)”, और स्थान था “गुरुकुल काँगड़ी (हरिद्वार)”।
साथ ही उसे अपना समर्थन देकर संपुष्ट करने और लोकप्रिय बनाने वाले थे नोबल पुरुस्कार प्राप्त गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर। इन दोनों महापुरुषों ने गाँधी जी के प्रति सम्मान व्यक्त किया| उसी का परिणाम था की कालान्तर में ‘महात्मा’ संबोधन गाँधी जी के नाम का पर्याय बन गया।

(1) Dear Mahatma ji
Mr. Andrews has familiarized your name and your work to me. I feel I am writing to no stranger. I hope therefore that you will pardon me for addressing you by the title which both Mr. Andrews and I have used in discussing you and your work.
………. (The collected Works of Mahatma Gandhi)
Vol. 14; P. 136-137
(2) Young India ; 6 January 1927.
(3) The collected Works of Mahatma Gandhi, Vol 14, P, 355-356
(4) The wonders why RT was not present when Gandhi arrived – There was no compelling reason to stay in Calcutta at this time…..probably for his own complex reason, RT deliberately avoided welcoming Gandhi to Shantiniketan on first arrival (Dutta & Robinson: Rabindranath Tagore; University of Cambridge; P, 196-1967)
(5) शांतिनिकेतन में आयोजित बैठक में गाँधी जी ने भी इस बात पर दुःख व्यक्त किया कि गुरुदेव यहाँ नहीं हैं (The collected Works of Mahatma Gandhi, Vol. 14, P. 364)
(6) ” I hope Mr and Mrs Gandhi have arrived in Bolpur and Shantiniketan has accorded them welcome as befits her and them. I shall convey my love to them personally when we meet ” (Krishna Dutta, Andrew Robinson: Selected Letters of Rabindranath Tagore; The Crest of Wave; University of Cambridge; P. 158)
(7) ” Andrew changed ‘Mr’ to ‘Mahatma’ when he published this letter in 1920s” (Krishna Dutta, Andrew Robinson: Selected Letters of Rabindranath Tagore; The Crest of Wave; University of Cambridge; P. 158-159)
-डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री
पूर्व सदस्य, हिंदी सलाहकार समिति, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार
सेवानिवृत अध्यक्ष, राजभाषा विभाग,
स्टेट बैंक ओंफ इंडिया, केन्द्रीय कार्यालय, मुम्बई
पी – 138, एम आई जी, पल्लवपुरम फेज़ – 2, मेरठ, 240110.

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