मूर्तिपूजा की वैज्ञानिक शल्य-क्रिया (ऑपरेशन)

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सृष्टि की रचना किसने की? उसे बनाने में उसका क्या प्रयोजन था, उसने सृष्टि क्यों और कैसे बनाई? किसके लिए और किसलिए बनाई?

यहीं वो प्रश्न हैं जो मानव सभ्यता के आदिकाल से ही मानव मस्तिष्क को कुरेदते रहे हैं! (जिसका ठीक ठीक उत्तर वेदों को छोड़ अन्यत्र कहीं नहीं मिलता)

क्या ईश्वर है भी? या सृष्टि स्वतः बनी? यदि ईश्वर है तो कैसा होगा?ऐसे ही अनेक प्रश्न भी हैं।

मनुष्य इनका उत्तर पाने के लिए आदिकाल से ही लालायित रहा है, क्योंकि मनुष्य को पशुओं से ऊपर उठकर मानसिक आहार भी चाहिए। प्रश्न यह भी है की क्या कारण है कि मानव आदिकाल से उस अदृश्य , अदर्शित, अज्ञात के पीछे लगा आया है, उसे तरह तरह से प्रसन्न करने व विभिन्न पूजा विधियों की उत्पत्ति का आधार क्या है? क्यों मनुष्य इन सबके पीछे लगा हुआ है?

इन सबका सार्वभौम कारण है *”ईश-वृत्ति”*! जी हाँ! अन्य पशुओ और मानवो में तरह तरह की प्राकृतिक वृत्तियां पायी जाती है, जैसे -“रति-वृत्ति”, “समुदाय-वृत्ति” “भय वृत्ति” इत्यादि। परंतु आहार, निद्रा ,भय,मैथुन के अतिरिक्त बुद्धि प्रधान होने के कारण मनुष्य में “जिज्ञासा वृत्ति तथा “ईश-वृत्ति” भी पायी जाती है।

अब समझते हैं वृत्ति क्या है?

क्षमा कीजिएगा मैं इसको स्पष्ट करने के लिए “रति-वृत्ति” को चुनूंगा। यदि आप जानवर पालने के शौक़ीन हैं तो आपने देखा होगा जब आप अपने घर में कोई शिशु-जानवर रखते है तो आप उनके वंशवृद्धि के लिए दोनों पक्षों के जन्तुओ(नर-मादा) का चयन करते हैं, समय आने पर दोनों ही सन्तानोत्पत्ति की क्रिया में प्रवृत्त होते हैं। परंतु आपने कभी सोचा है कि जब कभी उन जन्तुओ ने इस क्रिया को न कभी देखा था और न ही प्रशिक्षण लिया था फिर कैसे वे रति क्रिया को सम्पन्न कर सके?? इसका एक ही उत्तर है जीवों की *”रति-वृत्ति”*। अर्थात वे ही क्या हम सब भी प्रकृति में इस प्रकार प्रोग्राम (संरचन) किये गए हैं।जो स्वतः फलित हो जाते हैं, किसी ने हमें वैसा बनाया ही था। आप कभी यह भी देखते है कि ऋतु आने के पश्चात यदि जंतुओं को सविपक्षी न मिले तो उनका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, कुत्ते तो जरा जरा सी बात पर कभी कभी काट भी लेते हैं। सोचिये सविपक्ष की अनुपस्थिति में उनकी क्या स्थिति होती है। ठीक उसी प्रकार बुद्धिप्रधान होने से मानवो में सार्वभौम “इशवृत्ति” देखि जाती है। और यही कारण भी है कि अपनी इसी वृत्ति के परवश हो मनुष्य सदा से उस अदृश्य , अदर्शित, अज्ञात के पीछे लगा है, उसके न मिलने पर ,उसके वास्तविक स्वरुप के विषय में संज्ञान न होने पर मनुष्य विभिन्न पूजा पद्धतियों का आविष्कार करता आया है।

यह प्रवृत्ति कभी कभी इतनी प्रबल भी होती है की इसके लिए मनुष्यों से कुछ भी करवाया जा सकता है। उदाहरण के लिए औरंगजेब राजनितिक स्वार्थ के लिए दाराशिकोह को तब तक नहीं मरवा पाया जब तक वह उस पर ईशनिंदा का आरोप नहीं लगाया। कितनी आसानी से यह काम सम्पन्न हो गया जो अनेक युद्धों में भी असंभव सा दिखता था, ऐसे अनेक उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं। सारांशतः हमारा निर्माण(प्रोग्राम) ही इस प्रकार का हुआ है।

 

मानवों में पायी जाने वाली इशवृत्ति ईश्वर-अस्तित्व  का सबसे बड़ा प्रमाण है, जो नास्तिकों के गाल पर एक करारा तमाचा है। (ईश्वर अस्तित्व के सैकड़ों वैज्ञानिक प्रमाणों के लिए पढ़िए मेरा शोध “और मर गया ईश्वर…?”)|

 

निष्पक्ष विज्ञान-शोधियो तथा नास्तिकों ने स्वयं इस अनिवार्य वृत्ति को स्वीकारा है। परन्तु प्रश्न तब भी बना है कि आखिर इस इशवृत्ति का सही उपचार क्या है? क्या संसार भर में प्रचलित पूजा प्रणालियां , मूर्तिपूजा इत्यादि??

हम इसे एक और उदाहरण से स्पष्ट करते हैं-

देश में आयी सुखा-बुभुकक्षिका जैसी आपदाओ में आप भूख से व्याकुल लोगों को अभक्ष्य खाते-पीते देखा या सुना होगा, विकट स्थिति में न मिलने पर मनुष्य नर-माँस भी खा लेता है।  रेगिस्तान में पड़ा अति भूखा रेत, मिट्टी या कंकण पत्थर निगलते देखा गया है।

परंतु प्रश्न तो बना रहता है कि क्या वह उसका उचित भोजन है?

बिलकुल नहीं हमें उसे निश्चित ही रेत बालू मिटटी नरमांस या कंकण खाने से मना करना चाहिए क्योंकि वह उसका उचित भोजन नहीं है। वह अभक्ष्य है, ऐसा किसलिए होता है- उचित खाद्य के अभाव  में।

परन्तु भाइयों आप उसे क्या कहेंगे जो खाद्य उपलब्ध होने के उपरान्त भी अभक्ष्य खाता है, वह निश्चित रूप से मानसिक विक्षिप्त है।

ठीक इसी प्रकार ईश्वर के यथार्थ स्वरूप के ज्ञान के अभाव में मानव पूर्वकाल से उसे प्रसन्न करने हेतु ,कृतज्ञता, श्रद्धा, भय, स्वार्थ आदि विभिन्न कारणों से विभिन्न पूजा पद्धतियों का आश्रय लेता रहा है।

 

परन्तु उसके वास्तविक स्वरूप के ज्ञान के अभाव में वह अपने ईश-वृत्ति के अनुसार मानसिक भूख में अभक्ष्य, अनुचित खाता चला आया है। इसी अनुचित मानसिक अभक्ष्य का एक उदाहरण है मूर्तिपुजा, मनुष्यपूजा, अवतरपूजा!

 

प्रश्न यह है कि जब पवित्र विपुल ज्ञान-भण्डार वेदों में उसी परमपिता सच्चिदानंद हिरण्यगर्भ परमात्मा ने अपने स्वरुप का वर्णन किया है तब भी मानसिक अभक्ष्य ही क्यों ??

 

“न तस्य प्रतिमास्ति”

“अज एकपात”

“अकायम्”

“अस्नाविर”     -वेद

 

यतचक्षुषा न पश्यति येन चक्षुसिं पश्यन्ति!

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदं उपासते!!

जिसे आँखें नहीं देख सकतीं ,परंतु जिससे आँखें देखती हैं, उसे ही तू ब्रह्म जान ,इससे भिन्न किसी भी दिखाई देने वाले की उपासना कदापि मत कर!!     -केनोपनिषद

 

पाठकगण स्वयं विचारें

तमसो मा ज्योतिर्गमयः!

हे प्रभु! हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो!

 

वेदों की ओर लौटो!

ओ३म्

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