भारत के ऋषियों ने वेदों को कैसे सुरक्षित रखा?

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भारत के ऋषियों ने वेदों को कैसे सुरक्षित रखा? – प्रीतेश आर्य

चारों वेदों को छोड़कर अन्य लगभग सभी ग्रन्थों में न्यूनाधिक प्रक्षेप हुआ है. पूर्वाग्रह-रहित होकर निम्नलिखित मापदण्डों से प्रक्षेप (मिलावट) का पता चलता है:
१) अन्तर्विरोध या परस्पर-विरोध
२) प्रसंग-विरोध
३) विषय-विरोध
४) अवान्तर-विरोध
५) शैली-विरोध
६) पुनरुक्ति
७) वेद-विरोध

सारे मिलावट पिछले 2500 वर्षों में हुए हैं, जैसे मनुस्मृति के 2685 श्लोकों में, 1471 मिलावटी (प्रक्षिप्त) हैं, केवल 1214 शुद्ध श्लोक उपलब्ध हैं.
महाभारत में व्यासजी एवं उनके शिष्यों द्वारा रचित 10,000 श्लोक थे, जो विक्रमादित्य के काल में 20,000 श्लोक और राजा भोज के काल में 30,000 श्लोकों का हो गया.
आज १ लाख श्लोकों का महाभारत उपलब्ध है. शतपथ-ब्राहमण-ग्रन्थ, सांख्य-दर्शन, उपनिषद् आदि ग्रन्थों में मिलावट हुआ.

जब कोई विद्वान् हमारे भाइयों के ये बताने की कोशिश करता हैं की हमारे अधिकतर आर्ष-ग्रंथों में मिलावट की गई है, तो वो वेदों पर भी ऊँगली उठाते हैं
कि अगर सभी में मिलावट की गई है तो वेदों में भी किसी ने मिलावट की होगी…. मैं उन्हें बताना चाहता हूँ की हमारे ने किस तरह वेदों को सुरखित रखा…

इस लेख को पूरा पढने के बाद आपको अपने भारतीय होने पर अभिमान होगा की हमने ऐसे देश में और ऐसे सनातन वैदिक धर्म में जन्म लिया है जो दुनिया में सबसे महान हैं…

वेदों को सुरक्षित रखने के लिए उनकी अनुपूर्वी, एक-एक शब्द और एक एक अक्षर को अपने मूल रूप में बनाये रखने के लिए जो उपाय किये गए उन्हें
आज कल की गणित की भाषा में ‘Permutation and combination’ कहा जा सकता हैं..

वेद मन्त्र को स्मरण रखने और उनमे एक मात्रा का भी लोप या विपर्यास ना होने पाए इसके लिए उसे 8 प्रकार से याद किया जाता था….

वेद-पाठ को 3 प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
1) प्रकृति-पाठ
अ) संहिता पाठ (वाक्य पाठ): मन्त्र का यथार्थ पाठ (Recite as it is)
आ) पद पाठ : प्रत्येक पद (term) को अलग-अलग पढ़ते हैं.

2) क्रम पाठ: प्रथम पद + द्वितीय पद ,  द्वितीय पद + तृतीय पद…(1+2, 2+3, 3+4, 4+5, and so on…)

3) विकृति-पाठ: मन्त्र के पदों को तोड़-तोड़कर पदों को आगे पीछे दोहरा-दोहरा कर भिन्न-भिन्न प्रकार से पाठ करना

अ) जटा पाठ : (1+2 + 2+1 + 1+2), (2+3 + 3+2 + 2+3),…., and so on.
आ) माला पाठ
इ) शिखा पाठ: (1+2+3 + 3+2+1 + 1+2+3), (2+3+4 + 4+3+2 + 2+3+4), …and so on.
ई) रेखा पाठ
उ) ध्वज पाठ
ऊ) दण्ड पाठ
ए) रथ पाठ
ऐ) घन पाठ: (1+2+2+1 + 1+2+3 + 3+2+1 + 1+2+3), 2+3+3+2 + …. and so on.

पण्डित रघुनन्दन शर्मा ने इन 8 पाठों में से ३ पाठों को मुख्य माना है. पाठों के इन नियमों को “विकृति-वल्ली” नामक ग्रन्थ में विस्तार से दिया गया हैं….
परिमाणत: श्रोत्रिय ब्राह्मणों (जिन्हें मैक्समूलर ने जीवित पुस्तकालय नाम से अभिहित किया हैं) के मुख से वेद आज भी उसी रूप में सुरक्षित हैं
जिस रूप में कभी आदि ऋषिओं ने उनका उच्चारण किया होगा… विश्व के इस अदभुत आश्चर्य को देख कर एक पाश्चात्य विद्वान् ने आत्मविभोर होकर कहा था
की यदि वेद की सभी मुद्रित प्रतियाँ नष्ट हो जाएँ तो भी इन ब्राह्मणों के मुख से वेद को पुनः प्राप्त किया जा सकता हैं….
मैक्समूलर ने ‘India-What can it teach us’ (प्रष्ठ 195) में लिखा हैं —-
“आज भी यदि वेद के प्रकाश को कम से कम पाँच हजार वर्ष (मैक्समूलर के अनुसार) हो गए हैं… भारत में ऐसे श्रोत्रिय मिल सकते हैं जिन्हें समूचा वैदिक साहित्य कंठस्थ हैं ….
स्वयं अपने ही निवास पर मुझे ऐसे छात्रों से मिलने का सौभाग्य मिला हैं जो न केवल सम्पूर्ण वेदों का मौखिक पाठ कर सकते हैं, अपितु उनका पाठ सन्निहित सभी आरोहावरोह से पूर्ण होता हैं….
उन लोगो ने जब भी मेरे द्वारा सम्पादित संस्करणों को देखा और जहाँ कही भी उन्हें अशुद्धि मिली उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उन अशुद्धियों की और मेरा ध्यान आकर्षित किया….

मुझे आश्चर्य होता है उनके इस आत्मविश्वास पर जिसके बल पर वे सहज ही उन अशुद्धियों को ध्यान में ला देते थे जो हमारे संस्करणों में जहाँ-तहाँ रह जाती थी….”

वेदों की रक्षा के लिए किये गए इन प्रयत्नों की सराहना करते हुए मैक्समूलर ने अपने ग्रन्थ ‘Origin of Religion’ के प्रष्ठ 131 पर लिखा हैं —
“The text of the Vedas has been handed down to us with such accuracy that there is hardly
a various reading in the proper sense of the work or even an uncertain aspect in the whole
of the Rigveda”.

RigVeda Vol. I part XXV में मैक्समूलर ने पुनः लिखा —- :As far as we are able to judge we can hardly speak of various readings in the Vedic hymns in the usual sense of the word.
Various readings to be gathered from a collection manuscripts, now accessible to us there are none.”

वेदों को शुद्धरूप में सुरक्षा का इतना प्रबंध आरम्भ से ही कर लिया गया था की उनमे प्रक्षेप करना संभव नही था….
इन उपायों के उद्देश्य के सम्बंध में सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डॉ.भंडारकर ने
अपने ‘India Antiquary’ के सन् 1874 के अंक में लिखा था—“The object of there different arrangements is simply he most accurate preservation of the sacred text of the Vedas.

वेदों के पाठ को ज्यों का त्यों सुरक्षित रखने के लिए जो दूसरा उपाय किया गया था वह यह था की वेदों की छंद- संख्या, पद-संख्या, तथा मंत्रानुक्रम से छंद, ऋषि, देवता को बताने के लिए
उनकी अनुक्रमणियां तैयार की गई जो अब भी निम्नलिखित नामों से पाई जाती हैं

:
शौनकानुक्रमणी,
अनुवाकानुक्रमणी,
सुक्तानुक्रमणी,
आर्षानुक्रमणी,
छंदोंनुक्रमणी,
देवतानुक्रमणी,
कात्यायनीयानुक्रमणी,
सर्वानुक्रमणी,
ऋग्विधान,
ब्रहद्देवता,
मंत्रार्षार्ध्याय,
प्रातिशाख्यसूत्रादि |

इन अनुक्रमणिकाओं पर विचार करते हुए मैक्समूलर ने `Ancient Sanskrit Literature’ के प्रष्ठ 117 पर लिखा है की, “ऋग्वेद की अनुक्रमणी से हम
उनके सूक्तों और पदों की पड़ताल करके निर्भीकता से कह सकते हैं की अब भी ऋग्वेद के मन्त्रों शब्दों और पदों की वही संख्या हैं जो कभी कात्यायन के समय में थी….

इस विषय में प्रो. मैकडानल ने भी स्पष्ट लिखा हैं की आर्यों ने अति प्राचीन कल से वैदिक पाठ की शुद्धता रखने और उसे परिवर्तन अथवा नाश से बचाने के लिए असाधारण
सावधानता का उपयोग किया हैं….” इसका परिणाम यह हुआ की वेदों को ऐसी शुद्धता के साथ रक्खा गया है जो साहित्य के इतिहास में अनुपम एवं अतुलनीय हैं.

साभार:
ऋग्वेद-संहिता (सम्पादक: पण्डित दामोदर सातवलेकर)
आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता
(स्वामी विद्यानंद सरस्वती)

 

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