प्रचार-अभियान और आर्य समाज

0
322

आर्य समाज की प्रचार पद्धति के सबन्ध में विचार करने से पहले एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि संसार के धार्मिक कहे जाने वाले मत-पन्थों के प्रचार-अभियान और आर्य     समाज के प्रचार कार्य में बहुत बड़ा अन्तर है। पाखण्ड और अन्धविश्वास को धर्म स्वीकार कर चुका भारतीय जन मानस एक पाखण्ड से अच्छे और सरल लगने वाले दूसरे पाखण्ड को सहजता से स्वीकार कर लेता है। मूर्ति राम की न सही, कृष्ण की भी चलेगी, गणेश की न सही, हनुमान की भी चलेगी। यही परपरा आज यहाँ तक पहुँच गई है कि शिव का स्थान साँई ले सकता है और गली-गली में बनने वाले भोले-भैरों के मन्दिर से जिनकी कामना सिद्ध नहीं होती, वे उसी कथित श्रद्धा-भक्ति से किसी मियाँ की मजार या कब्र पर जाकर भेंट पूजा चढ़ाने चले जाते हैं।

आर्य समाज इन सबसे अलग हटकर बुद्धि और तर्क की बात करता है, जिन्हें हमारे पुराणी और कुरानी बन्धु सैकड़ों सहस्रों वर्ष पूर्व धार्मिक सोच से दूर भगा चुके हैं। यही कारण है कि तर्क और बुद्धि से काम लेने वालों को आज के धर्माचार्य व धर्मभीरु लोग बिना सोचे-समझे नास्तिक कह डालते हैं। वैसे यह एक कड़वा सच भी है कि तर्क और विज्ञान की बात करने वाले हमारे बुद्धिजीवी आज नास्तिक बन कर ही रह गये हैं। ऐसे में आर्य समाज को अपनी प्रचार-पद्धति की जाँच-परख करते रहना चाहिए।
यह सही है कि आर्य समाज की पहली पीढ़ी ने जितना, जो कुछ वेद प्रचार व समाज सुधार का काम किया, वह सब इसी प्रचार-पद्धति से किया है। ऐसे में प्रत्येक वेद भक्त और ऋषि भक्त आर्य का कर्त्तव्य है कि वह आर्य समाज के प्रचार कार्य को प्रखर और प्रभावी बनाने की दिशा में गभीरता से विचार करे और उसे व्यावहारिक बनाने के लिए कुछ ठोस कार्य भी करे।
आर्य समाज को नवजीवन देने के लिए हमें अपनी प्रचार-पद्धति में क्या कुछ बदलना पड़ेगा। यद्यपि आज आर्य समाज में ऐसे उपदेशक बहुत कम संया में हैं जो नित्य नियमित रूप से संध्योपासना व स्वाध्याय करते हों। जितने भी हों, प्रारभ के लिए ऐसे विद्वान् हमारे मध्य हैं जो संध्या व स्वाध्याय दैनिक कर्म के रूप में करते हैं। जो नहीं भी करते हैं, जब सिर पर आ पड़ेगी तो सब करने लग जाएँगे। आज समस्या यह है कि आर्य समाज में ‘सब धान सत्ताईस का सेर’ बिकता है। हमें सिद्धान्तनिष्ठ, धर्मात्मा, निष्कलंक, निर्लोभी और सरल स्वभाव के स्वाध्यायशील किसी एक विद्वान को अपने आर्य समाज में प्रचार कार्य के लिए कम से कम 8-10 दिन के लिए सादर आमन्त्रित करना चाहिए। उससे पहले आर्य समाज के पदाधिकारी व श्रेष्ठ सभासद मिलकर प्रचार योजना इस ढंग से बनायें – प्रतिदिन प्रातःकाल सुविधानुसार किसी पदाधिकारी या श्रद्धालु आर्य के घर यज्ञ व पारिवारिक सत्संग रखें, जिसमें एक घण्टे तक व्याख्यायुक्त यज्ञ हो और एक घण्टा धर्म, ईश्वर, वेद आदि की विशेषताएँ लिये हुए परिवार समाज व राष्ट्र से जुड़े हुए कर्त्तव्यों के पालन की प्रेरणा परक प्रवचन होना चाहिए। जिसके परिवार में यज्ञ व सत्संग हो, वह अपने परिचितों व पड़ौसियों को प्रेमपूर्वक आमन्त्रित करें। घर मीठे चावल बनाये, स्विष्टकृत् आहुति व बलिवैश्वदेव की आहुतियाँ देकर प्रसाद रूप में सबको वही यज्ञ शेष प्रदान करे। प्रातःकाल इतना करके दिन में किसी विद्यालय में कार्यक्रम रखने के लिए पहले से सबन्धित प्रधानाध्यापक आदि से मिलकर सुविधानुसार 40-50 मिनट का समय तय कर लें। आर्य समाज के एक या दो सज्जन आमन्त्रित विद्वान् को समानपूर्वक विद्यालय ले जाये और विद्या व विद्यार्थियों से जुड़े हुए विषय पर सरल व रोचक भाषा  शैली में वेद व वैदिक साहित्य के प्रमाणपूर्वक प्रवचन करें। वेद व आर्य समाज के प्रति श्रद्धा बढ़ाने की भावना का ध्यान पारिवारिक यज्ञ-सत्संग में भी रखना चाहिए और विद्यालयों में भी। कार्यक्रम के अन्त में सबको निवेदन करें कि वे सायंकाल आर्य समाज में होनेवाली धर्मचर्चा सत्संग में पुण्य लाभ प्राप्त करने हेतु अवश्य पधारें। सुविधानुसार एक दिन में दो-तीन विद्यालयों में प्रवचन रख सकते हैं। हमारी आज की पीढ़ी बहुत तेज तर्रार है, उसके मन-मस्तिष्क में धर्म और ईश्वर को लेकर अनेक प्रश्न खड़े होते हैं। लेखक लड़के-लड़कियों के कॉलेजों के अनुभव के आधार पर कह सकता है कि युवक- युवतियाँ बड़े तीखे प्रश्न करते हैं। ऐसे में आर्य समाज के गौरव को ये स्वाध्यायशील व साधनाशील आर्य विद्वान् ही बचा सकते हैं। नई पीढ़ी को प्रश्नों व शंका समाधान की छूट दिये बिना हम नई पीढ़ी के मन-मस्तिष्क को धर्म, ईश्वर व आर्य समाज की ओर नहीं मोड़ सकते, इसलिए किसी विद्वान् को बुलाने से पहले इस बात का ध्यान अवश्य रखें और उन्हें इसकी सूचना भी अवश्य कर दें।
दिन में इतना कुछ करके रात्रि में सबकी सुविधा व अधिकतम लोगों के आगमन की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए दो घण्टे का कार्यक्रम बनायें। दिन में अगर अधिक प्रश्न व शंकाएँ रखी गई हों तो उनके उत्तर रात्रिकाल के सत्संग में रखे जा सकते हैं या समाज के सुधी जन कार्यक्रम बनाते समय कुछ उपयोगी व सामयिक विषय निश्चित कर सकते हैं। इस प्रकार एक दिन का यह कार्यक्रम है। ऐसे ही ८-१० दिन का कार्यक्रम बनाकर हम इसके अनुसार प्रचार-कार्य करके अपने समय, श्रम व संसाधनों का सटीक सदुपयोग करके बहुत लाभ प्राप्त कर सकते हैं। प्रसंगवश एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य की ओर आर्य जनों का ध्यान आकर्षित करना बहुत आवश्यक है। प्रचार कार्य में प्रवचन और सत्संग से अधिक भूमिका साहित्य की होती है। प्रचार को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है कि हम ऋषि दयानन्द के लघु ग्रन्थों, स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम, पं. चमूपति, स्वामी दर्शनानन्दजी, स्वामी वेदानन्द जी जैसे सिद्धान्तनिष्ठ विद्वानों के साहित्य को बहुत बड़ी मात्रा प्रकाशित करा कर अल्प मूल्य में उपलध करायें। आर्य समाज को इस दिशा में भी गभीरता से सोचना पड़ेगा। पहली-दूसरी पीढ़ी के गभीर, सिद्धान्त जीवी वैदिक विद्वानों के साहित्य का उद्धार करना आज की बहुत बड़ी माँग है, ऐसा न हो कि कल बहुत देर हो जाए। वेद प्रचार को जीवन्त बनाने के लिए सत्य साहित्य, सिद्धान्तनिष्ठ प्रवचन-सत्संग ही एक मात्र उपाय है। हमारे सुधी पाठक इस पर गभीरता से विचार करके देखेंगे तो लगेगा कि बिना लबी-चौड़ी भागदौड़ के, बिना किसी ताम-झाम के, बिना किसी बड़े खर्चे के – एक सीमित आय वाले आर्य समाज भी इसका लाभ ले सकते हैं।

कुछ लोग यह कहते हैं कि आर्य समाज का सांगठनिक ढाँचा आज के समय के अनुकूल नहीं है। ऐसे लोग लोकतान्त्रिक पद्धति की न्यूनताएँ गिनाने लगते हैं, लेकिन वे महर्षि दयानन्द की वेद विद्या से प्राप्त दूरदृष्टि को समझ नहीं पाते। नियम-सिद्धान्त कितने ही उच्चस्तर के हों, अगर व्यक्ति निम्न स्तर के हैं तो अति महत्त्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी करके, साधारण या मनोनुकूल तथ्यों पर अधिक ध्यान केन्द्रित करके वे अच्छे-अच्छे नियम-सिद्धान्तों का दुरुपयोग कर डालते हैं। आर्य समाज के संगठन सबन्धी नियम-उपनियमों के साथ ही हमारे कर्णधार लबे समय से यही करते चले आ रहे हैं।

 

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY