ईश्वर एक ही है

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सत्यप्रेमियों! ईश्वर एक है या अनेक इस विषय को लेकर आर्य समाजियों और पौराणिक पक्ष में मतभेद रहा है, मतभेद का कारण हिन्दू समाज में पौराणिक पक्ष का वेदों से दूर होना रहा और आर्यसमाजियों का वेदों के निकट आना रहा । वेदों से दूर होने के कारण एक ईश्वर की जगह कई ईश्वर और ईश्वरीय अवतार की मान्यता सनातन धर्म में पङ गई, लोग तरह-तरह के ईश्वर मानने लगे, कई पूजा पद्धतियाँ विकसित हो गई , वेद के स्थान पर अन्य ग्रन्थों की कथायें चल पङी। कोई किसी ईश्वर को मानता तो कोई किसी ईश्वर को , कोई शाक्त था, तो कोई वैष्णव और शैव । पुराणों में ब्रह्मा. विष्णु, शिव, आदिशक्ति को मूलादि के रुप में माना गया अर्थात् कोई कहता ब्रह्मा से संसार उत्पन्न हुआ है, तो कोई पुराण कहता विष्णु से, कोई कहता शिव से तो कहता आदिशक्ति से ।

इस प्रकार कोई निश्चित मान्यता न होने के कारण सनातन धर्म ” वेद धर्म ” से विमुख होकर ” पौराणिक मत ” बन गया अर्थात् ” वेदों ” के स्थान पर पुराणों को मानने वाला बन गया ।

पौराणिकों का मान्यता हो गई कि ईश्वर है तो एक पर जब-जब पृथिवी पर पापी बढ़ जाते हैं तो उनके नाश के लिए ईश्वर अवतार लेता है और पापियों का नाश करता है ।

ऐसी मान्यता पर पौराणिकों ने विचारा नहीं कि जो एक है वो अनेक कैसे हो सकता है ? एक में अनेक का निषेध है और अनेक में एक का । कोई बुद्धजीवी ये बात कह सकता है कि जैसे मनुष्यों को अनेक होते हुए भी एक होने/रहने की सलाह जी जाती है वैसे ईश्वर अनेक होते हुए भी एक हैं और होते हुए भी अनेक है ।

आईये ऐसे बुद्धिजीवियों के कथन पर विचार करते हैं और उनकी दुर्बलता देखते हैं। देखो ! जब कहा जाता है कि मनुष्य एक हों तो ऐसा कहने का प्रयोजन उनके विचारों की समानता, एक-दूसरे को परस्पर सहयोग की भावना और आपसी भाईचारे से है न कि स्वरुप से ।

इसके ठीक विपरीत ईश्वर स्वरुप से ही एक है उसके अनेक होने की मान्यता हास्यापद है। पाठक गण विचार करें क्या ईश्वर एक रहते हुए अपने कार्य को करने में अक्षम था ? क्या ईश्वर को पापियों का नाश ठीक वैसे नहीं कर सकता जैसे ओसामा बिन लादेन , सद्दाम हुसैन, विरप्पन, जलियाँवाला काण्ड के आरोपी डायर का नाश कर दिया ?

क्या अवतार लेना ईश्वर की मजबूरी है ? क्या ईश्वर बिना अवतार लिए पापियों को दण्ड नहीं दे रहा ?

क्या ईश्वर बिना अवतार लिए समस्त संसार में क्रिया नहीं कर रहा ?

हमारे धर्म ग्रन्थ वेद में भी ईश्वर के एक और जीवों के अनेक होने के मन्त्र उपस्थित है , क्या उनका भी निषेध किया जा सकता है? देखो यजु: 32/14 में ” याँ मेधां देवगणा: पितरोश्चोपासते। तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ””

इस मन्त्र में दो शब्द देखिए ” देवगणा: ” और ” पितर ” ये दो शब्द अनेक संख्या के वाचक हैं , पर किसके परमात्मा के नहीं जीवात्मा के लिए अनेक संख्या के वाचक हैं । ” देवगणा: ” अर्थात् अनेको विद्वान और ” पितर” अर्थात् रक्षा करने वाले ज्ञानी लोग ।

मन्त्र का भाव ये है– हे अग्ने ! अर्थात् प्रकाशस्वरुप परमेश्वर आप की कृपा से जिस बुद्धि की उपासना विद्वान, ज्ञानी और योगी लोग करते हैं उसी बुद्धि से युक्त हम को इसी समय आप बुद्धिमान काजिए ।

अब एक और मन्त्र देखिये —
” य: प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव । य ईशेऽस्य द्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषा विधेम ”” यजु: 23/3

अर्थ- य प्राणतो निमिषतो- जो प्राण धारण और पलक मारने वाले जगत:= जगत का, महित्वा= अपनी महिमा से राज बभूव= राजा होता है , य: ईशे अस्य द्विपद: चतुष्पद:= जो इस संसार और दो पैर वाले, चार पैर वाले का ईश है,

कस्मै देवाय हविषा विधेम = ऐसे आन्नदरुप अतिमनोहारी परमेश्वर की विशेष भक्तिभाव से सेवा करें ।

इन मन्त्रों में कितने स्पष्ट शब्दों में परमात्मा के एक और जीवों का अनेक होना बताया है , ऐसे ही जब आप वेद पढ़ेगे तो पदे-पदे आपको परमात्मा के एक और जीवों के अनेक होने के मन्त्र मिल जायेंगे पर यहाँ केवल दो दिये गये क्योंकि बुद्धिमानों के लिए तो एक ही अधिक है और मूर्खों के लिए अधिक भी कम। अत: पाठक गण से निवेदन है कि वो वेद का स्वाध्याय करें ऋषि दयानन्द रचित सत्यार्थ प्रकाश और ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका पढ़े ताकि सभी संशयों का निवारण भी हो सके । इति|

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